
शब्द और भाषा के पहले
मैं कई बार
यही सोचती हूं कि
सृष्टि में जब पहली बार मिले होंगे
आदम और हव्वा तो
कैसे उन्होंने
बगैर शब्दों
बगैर भाषा
एक दूसरे को समझाए होंगे अपने सुख देख और
किस कदर
वे दौनों
चकित हुए होंगे
चांद तारों झरनों पहाड़ो आसमान में
इन्द्रधनुषी रंगों को देखकर वे झूम उठे होंगे
मंजर कई सारे और भी देखें होंगे उन्होंने साथ साथ
मसलन,शाख से
पत्ते का टूटना
कोंपल का लहलहाना इनमें
महसूस किया होगा जीवन को
बगैर शब्द बगैर भाषा वे
परिभाषित करते रहे अपना युग
हमसे बेहतर युग में थे आदम और हव्वा
हमारे पास
शब्द,भाषा,समझ,सोच,सबकुछ फिर भी
क्यों इतना कठिन है
जीवन
समय और आज का
आदमी
सोचती हूं निःशब्द हो जाती हूं
कई कई बार मैं इतनी सी
इसी बात पर
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घोंसला
सांझ होते ही वह बंया
जिसके लिए लौट रही है
उसे वहां नहीं पाया तो
कितनk रोएगी वह
कहां कहां नहीं भटकेगी
मारे डर के इधर उधर
सर छुपाने लायक हमारी तरह वे भी
ज़रा सी जगह
कितनी मेहनत से
बनाया करते हैं
अपने ड्राइंग रूम में सजाने हम है कि
उनके घोंसले उठा लाया करते हैं ।
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क्वार में
क्वार में लगते ही दादी गांव का
कच्चा घर लीपने छाबने को किस कदर
भिड़ जाया करती थी
उतावली इतनी कि घर भर में से
किसी की बाट जोहे बगैर अकेले ही
मोटे मोटे लदेडे,फोड़ेती लीपणा,छाबती लीपती
बामुश्किल
निसरनी पर चढे भीतें,चांद्या छाबती लीपती
सबसे पहले वह रादणी लीपती फिर कोठरी
परेण्डीवाली और गलियारे के बाद बैठक
अंधेरी ओसरी,तुलसीक्यारी,आंगन
ढोरकोठा,ओटला ओटली लीपणे से महक उठते थे
सब छाव लीपकर वहां चोक पूरती,अक्षत चढ़ाती
दीया जलाती तब कहीं दादी
फुर्सत में नास्का सूंघते बतियाने
बाखल में जा बैठती
जमाना हुआ दादी को गुजरे साथ ही कच्चे घरों
छाबने लीपने का दौर भी नदारद हुआ अब
बाखल ही नहीं गांव भर में चूना सीमेन्ट
ईटों वाले घर है जिनमें रहते हुए हमें
पता ही नहीं चलता कभी का लग चुका
महीना क्वार का
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1 टिप्पणी:
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