
देह का संगीत
वह अंतिम बार
मेरे सीने से लगी
सर्द रातें
साये के बिना बारिश
तपती धूप में
वह याद आई ।
मुझे सुन रही होगी
इस वक्त भी
किसी के सीने से सटी
मैं सितार नहीं
सरोद नहीं
सारंगी नहीं
बंसी नहीं
फिर भी
बजने से पहले
अनंत तक उसके लिए
देह मचलती रही ।
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ढेरों काम
ढेरों काम
पड़े हैं उसके पास
टी वी देखना
स्वेटर बुनना
तीसरी मंजिल तक
पानी की बाल्टी पर
बाल्टी बन हांफना
कविता सुनने की
उसे फुर्सत नहीं ।
उसने सबक रटा
एक मेमने के
गले में
बस्ता लटकाया
कंकरीली सड़क पर
निकल गई ।
मुझे छोड़ गई
दाल में करछुली
हिलान को ।
अब सोच रहा प्याज
कतरते हुए
उसके पैर में
चप्पल डाली कि नहीं ।
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गणेश
इनकी चार भुजाएं
ये लंबी सूंड
इत्ता भारी पेट
चलते होंगे किस तरह
आले में बैठे हैं
धूल के बीच ।
मैंने उससे पूछा
वह आंसू टपकाती रही
अतीत में रही किसी व्यथा से
अपनी करूणा में ।
अंधेरे में उसे टटोलते
मुझे अचानक लगा
यह अंगुली उसकी नहीं
अगरबत्ती के किसी कारखाने से
अभी कुछ देर पहले लौटी
एक औरत की है
जो मुझे एक बिलात दूर सोई
अब हिचकियां लेने लगी ।
सूंड और दो पैर उठाए
मैं हाथी था अपनी हताशा में
चिंघाड़ता पूरा जंगल था
उस रात सन्नाटे में
फटकारे जा रहे असंख्य सूप
दिशाओं में उड़ रहा धान ।
हवाओं की चादर तनी थी
समेट रही करोड़ों अंगुलियां
भरे थर पस के पस
भूसे बगदे बालियों से घिरा मैं ।
मुंह ढांपे एक
गरीब सपना था
मेरी चारपाई पर ।
झुर्रियोंदार अंतरिक्ष तक
फटा प़ड़ा था
भूख का पेट ।
नृत्य करते मोदक बांद आए
हारे थके उसके आले में अब
आ बैठs गणेश ।
मैं रोज़ अगरबत्ती सा
सुलगता हूं
उसकी फटी बिवाई वाली आंखों में ।

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